Gold Medal ( Wilma Rudolph ) एक विकलांग लड़की की कहानी - Gyanhindime

विल्मा रुडोल्फ का प्रारंभिक जीवन – Wilma Rudolph Early Life Information 

Wilma Rudolph ki kahani
Wilma Rudolph ki kahani


विल्मा रूडोल्फ का जन्म 23 जून 1940 को अमेरिका की सेंट भेथलेम नामक जगह पर हुआ था। उनके पिता ईडी रुडोल्फ एक कुली थे। और माँ ब्लांच घर की आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से नौकर का काम करती थी। विल्मा का जन्म समय से पहले ही हो गया था। जिसकी वजह से वह काफी कमजोर थी। और जन्म के समय उनका वजन करीबन 2 किलो था। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक बच्चे का जन्म करीब ढाई किलो से 3 किलो तक होना चाहिए।

 कमजोर पैदा होने की वजह से विल्मा काफी बीमार रहती थी। फिर भी कैसे भी करके बीमारियों से लड़ते हुए जब विल्मा4 साल की हुई तो उन्हें पोलियो हो गया। और पोलियो की वजह से उन्होंने अपने बाएं पैर की ताकत खोदी। जिसके बाद विल्मा को चलने के लिए कैलीपर्स का सहारा लेना पड़ा।

उस समय नस्लभेद चरम पर था। और अश्वेत अमेरिकी लोगों के इलाज के लिए, बहुत ही कम अस्पताल हुआ करते थे। इसीलिए विल्मा की मां को उनके इलाज के लिए, 80 किलोमीटर हर हफ्ते जाना पड़ता था। और काफी दिनों तक इलाज करने के बाद डॉक्टरों ने भी मान लिया, कि विल्मा अब अपने पैरों पर कभी नहीं चल पाएंगी। लेकिन उनकी मां ने कभी हिम्मत नहीं हारी। और अपनी तरफ से घरेलू इलाज करती रही।

 विल्मा की मां बहुत ही सकारात्मक सोच वाली महिला थी। और वह हमेशा विल्मा को प्रेरित करती रहती थी। उन्होंने कहा कि विल्मा अपने पैरों से जरूर चल पाएंगी। इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है। बच्चों को खेलते देख विल्मा को भी खेलने का मन करता था। लेकिन अपने विकलांगता की वजह से वह कुछ नहीं कर पाती थी।
एक बार विल्मा ने अपनी टीचर से सवाल किया, कि ओलंपिक में कैसे खेल होते हैं। इस सवाल पर पूरी क्लास हंसने लगी। और टीचर ने भी कहा कि तुम क्या करोगी जानकर तुम तो कभी नहीं चल सकती। इस घटना से विल्मा की आंखें भर आई और वह कुछ भी नहीं बोल पाई।

 और जब खेल के पीरियड में जब विल्मा को सभी बच्चों से अलग कर दिया गया, तब उन्होंने दृढ़ निश्चय लिया। और अपने आप से बोली, की मां सही कहती हैं की लगन सच्ची और इरादे बुलंद हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। "मैं भी किसी दिन ओलंपिक में जाऊंगी और जीत कर आऊंगी"। अगले ही दिन पूरी तैयारी के साथ विल्मा ने अपने पैरों में लगे कैलिपर्स को निकाल फेंका। और पूरी ताकत लगाकर अपने पैरों पर चलने की कोशिश शुरू कर दी।

 शुरुआती दिनों में तो काफी दर्द हुआ, और कई बार चलने की वजह से गिरने से उन्हें काफी चोट लगी। बहुत बार गिरते संभलते उन्होंने धीरे-धीरे चलना सिखा। फिर वह एक पैर में ऊंची एड़ी के जूते पहनकर खेलने लगी। विल्मा के डॉक्टरों ने कहा था, कि वह कभी कैलिपर्स के बिना नहीं चल पाएंगे। लेकिन विल्मा के जज्बे को देखकर। वह हैरान रह गए। और उनकी आंखें भर आई। और उन्होंने कहा कि बेटी तू कुछ भी कर सकती है।

 मां के समर्पण और विल्मा की लगन के कारण, 11 वर्ष की आयु में पहली बार विल्मा बास्केटबॉल खेली। और फिर विल्मा के जज्बे को देखकर स्कूल के टीचर्स ने भी बिल्मा की मदद की। और फिर इस सफलता के बाद विल्मा पूरे जोश और लगन के साथ प्रैक्टिस में लग गई। विल्मा ने पहली बार 1953 में 13 साल की उम्र में स्कूल की रेसिंग में हिस्सा लिया। लेकिन वह लास्ट आई। लेकिन उन्होंने अपना विश्वास नहीं खोया, 

और पूरी लगन से प्रैक्टिस करती रही। और आखिरकार 8 हार के बाद उन्होंने 9वी रेस से जीतना शुरू किया। और उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। और अपनी मेहनत, लगन और जज़्बे के बल पर 1960 के रोम ओलंपिक में अपने देश की तरफ से खेलने का मौका दिया गया। ओलंपिक में विल्मा ने, 100 मीटर दौड़ 200 मीटर दौड़ और 400 मीटर रेले में गोल्ड मैडल जीतकर इतिहास रच दिया। इस तरह विल्मा अमेरिका की पहली अश्वेत महिला खिलाड़ी बनी। 

जिसने दौड़ की 3 कंपटीशन में गोल्ड मेडल जीते। और फिर तीन गोल्ड मेडल जीतने के बाद अमेरिका वापस आने पर उनका स्वागत एक बहुत ही बड़ी पार्टी से किया गया। जिसमें पहली बार श्वेत और अश्वेत अमेरिकी लोगों ने भाग लिया। जिसे विल्मा अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी जीत मानती हैं। विल्मा अपनी जीत का श्रेय हमेशा अपनी मां को दिया। वह कहती हैं,

 कि अगर उनकी मां ने त्याग नहीं किया होता, तो वह आज इस मुकाम पर नहीं होती। आपको एक बात याद रखनी चाहिए।

कि मुश्किल इस दुनिया में कुछ भी नहीं, फिर भी लोग अपने इरादे तोड़ देते हैं। अगर सच्चे दिल से हो चाहत कुछ पाने की, तो सितारे भी अपनी जगह छोड़ देते हैं।
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Hemraj Kumar 


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